गुरुवार, 14 जनवरी 2010

वादों-दावों के जंगल में मतदाता

बात राजनीति की लीजिए तो पता चलता है कि देश में चुनावी बिगुल कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बजता ही रहता है और अनेक नए-पुराने नेता विभिन्न दलों के सहारे या निर्दलीय के रूप में बरसाती मेंढक की तरह टर्राने लगते हैं। वे अपने साठ अनेक दावे और वाडे भी लेकर आते हैं क्योंकि चुनाव जीतने के लिए ये ही तो अचूक हथियार बनते हैं यदि नेताजी को इनका सूझबूझ के साथ प्रयोग करना आ जाए तथा मतदाता रूपी इष्ट देव को वह भा जाए। तीर तरकश से निकलकर सीधा निशाने पर जा लगे तो नेताजी के वारे न्यारे और मतदाता बेचारा फिर से भगवान के सहारे। आगामी चुनाव तक मतदाता भी भूल जाता है पहले चुनावपूर्व दावे और वादे। यही क्रम चलता आ रहा है। कबतक चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। इसीलिए अब मतदाताओं को जागरूक करने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास शरू हो रहे हैं। लेकिन ये कबतक चलेंगे या कुछ समय बाद दम तोड़ देंगे,कुछ कह पाना समय से पहले की बात है। (मेरा अन्य ब्लॉग है: parat dar parat)

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