शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

jivn ke lakshy ko pane ke lie sadhan ko parakho

हम जीवन में अपने  लक्ष्य को पाने के लिए, अपने  निश्चय को मूर्तरूप देने के लिए सदा लालायित रहते हैं। यह अलग बात है कि लक्ष्य तक पहुँचते पहुँचते अनेक रुकावटें अनेक अडचनें आती हैं। लक्ष्य प्राप्ति के प्रति दृढ निश्चय की स्थिति में ये सब बौनी  साबित होती हैं और इन्सान अपने लक्ष्य को पाने तक अविरल प्रयास करते हुए सफलता की सभी सीढियाँ चढ़ लेता है। बेशक यह सब इतना आसान नहीं होता। परन्तु धैर्य खोए बिना निरंतर लक्ष्यपथ पर अग्रसर होते हुए हम सभी तरह की विघ्न बाधाओं को पार कर लेंगे यह सोचकर अपना कार्य सही दिशा में करते रहने से हिम्मत के साथ साथ लक्ष्य से नजदीकियां भी बढ़ती जाती हैं। शुरुआत में कुछ विचलित करने वाली अडचनें ऐसी आती हैं जो इन्सान को बहुत दुखी  कर देती हैं और उसे अपने आप पर विश्वास में कमी सी महसूस होने लगती है। ऐसी स्थिति में अपने साधनों पर पुनर्विचार की जरुरत होती है और तदनुसार आवश्यक सुधार कर लेने से राह कुछ सरल हो ही जाती है।चलना भी सहज हो जाता है।  इसे अजमाया जाना चाहिए। 
मेरा अन्य ब्लॉग है : parat dar parat

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

jindagi jo de vahee sahee hai, maan lo...

जिन्दगी जो दे वही सही है

जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है, मुर्दे भी क्या खाक जिया करते हैं ।यह बात हम बहुत पहले से सुनते आ रहे हैं। न जाने किसी ने क्या सोचकर कही थी यह बात जो आज जिन्दगी से हारने की दहलीज पर आ चुके अनेक लोगों के लिए संजीवनी से कम नहीं। हम हर तरह से संभलकर चलने की भरपूर कोशिश करते हुए भी कभी कभी जिन्दगी के ऐसे दलदल में फंस जाते हैं जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती।  प्राय: उस कसूर की सजा भी हमें भुगतनी पड़ जाती है जो हमने किया ही नहीं होता । यह विडम्बना सभी को कभी न कभी किसी न किसी  रूप  में भोगनी पड़ती  है ;  चाहे  मानें या न मानें। जिन्दगी के कड़वे घूँट न चाहते हुए भी पीने पड़ते हैं- चुपचाप। न गिला  न शिकवा ।  इसके लिए कोई गुंजायश ही न छोडी जाती। फांसी पर चढ़ने  वाले से भी  बुरा हाल हो जाता है  इंसान  का। कोई सुनवाई नहीं; यदि है तो बेमतलब, बेनतीजा। ऐसी स्थिति में इन्सान निराश और उदास हो जाता है, अवसाद से भर जाता है। कई बार हालत के वशीभूत होकर बहुत भयानक कदम उठा लेता है जिससे उसकी जिन्दगी तो बर्बाद हो ही जाती है, कई औरों को भी लपेट लेता है। किन्तु यह सही नहीं है। ऐसे समय पर ही जिन्दगी की जिन्दादिली काम आती है। इस स्थिति में सामान्य व  सहज तथा  शांत  रहना  निहायत जरुरी है। बस यह मानकर अच्छे वक्त के आने का इंतज़ार करे कि जिन्दगी जो दे वही सही है।  
मेरा अन्य ब्लॉग है : parat dar parat 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

jalta diya lalta rahe

जलता दीया जलता  रहे

हम सभी एक आदत से लाचार हैं कि सामने वाले को अपने से कम समझदार व अकलमंद मानकर चलते हैं और अपने विचारों को ही सर्वोत्तम व सर्वोपरि मानते हैं। इस धुन में हम अपने अवगुणों को भी अपनी विशेषता कहकर दूसरों का मुंह बंद करने की कोशिश  करते हैं जिसकारण प्राय: मुंह की खानी  पड़ती है और शर्मसार भी होना पड़ता है। ऐसा बार बार होता है और इस तरह यह आदत में शुमार हो जाता है। फिर हम इसे स्वाभाविक मानकर चलते हैं और अंतत: अकेले पड़ जाते हैं. इसके लिए भी हम दुनिया को ही दोषी ठहराते हैं और अपने आप  को बेकसूर ।

रविवार, 18 मार्च 2012

मानव तेरी दुनिया में
मानव तेरी दुनिया में
यह क्या हो रहा है ;
एक ओर जलते भवन
बिकते जिस्म
दूसरी ओर राजनीति
जले घरों की राख पर
मरे जनों की लाश पर
एक तरफ भूख गरीबी
बहुमत  में बदनसीबी
दूसरी तरफ विकास का ढिंढोरा
लगता है दिखावा कोरा
यहाँ भूख मिटाने को रोटी नहीं
नंगा तन ढकने को धोती नहीं
वहां खाने बहुत पर भूख नहीं
कपडे बहुत पर उनमें सलूक नहीं
कहीं प्रतिभा  दम तोड़ रही

जवानियाँ बम फोड़ रहीं
कहीं खरीदी जा रही डिग्री
धन के आगे मानवता हिली
दंगे कहीं हो रहे धर्म के नाम पर
कर्णभेदी शोर है कर्म के नाम पर
कहीं धर्म की मर्यादा तोड़ते धर्मी
मिलें कुकर्मों में लिप्त शोरकर्मी
काम क्रोध लोभ मोह
त्यागने का उपदेश दे जो
इन्हीं विकारों में लिप्त वो
करें व्यर्थ उसी उपदेश को
मानवता की बात वो कर रहे
धर्मनिरपेक्षता  का दम भर रहे
बाँट इंसानों को आज वो डटे हैं
दंगाइयों के सरताज जो बने हैं
किस किस को क्या क्या कहें
बेहतर है इतने में ही चुप रहें
हो चुकी जहाँ लाइलाज बीमारी है
वहां चुप रहना मजबूरी हमारी है
लेकिन मानव तेरी दुनिया की
ये हालत देखकर हताश हूँ
फिर भी तेरी असीम शक्ति को
जानते हुए मैं नहीं निराश हूँ. 

-ईश्वर   भरद्वाज



बुधवार, 11 जनवरी 2012

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

jindagee jeekar dekhen

जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब व्यक्ति को अपने जीवन के आचार  व्यवहार को नजदीक से देखने का अवसर मिलता है और वह कईबार विचलित होकर तथा अनेक बार घबराकर अपने को असहाय व निरीह सा अनुभव  करने लगता है. यह सही नहीं है.  इस बात से कतई इंकार नहीं  किया जा सकता कि जिन्दगी में समरूपता किसी को भी नहीं मिली है और न ही मिलने की कोई उम्मीद ही रखनी चाहिए . जिन्दगी फूलों की नहीं काँटों की सेज मानकर चलने से हम आने वाली चुनौतियों के लिए स्वयं को तैयार कर लेते हैं और उनपर प्राय: विजय पा लेते हैं. जिन्दगी से हमें ढेरों शिकायतें हो सकती हैं लेकिन जिन्दगी से ही हमें हर खुशी भी मिलती हैं, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. हम माँ- बाप से ढेर सारा प्यार पाते हैं और साथ ही डांट डपट भी खाते हैं. फिर भी हम उनसे सारी जिन्दगी जुड़े रहते हैं. हाँ ,  यहाँ कुछेक अपवादों की बात नहीं कह रहा . जिन्दगी को जीना सीख गए तो जिन्दगी स्वर्ग से भी बढ़कर हो जाती है. क्यों न हम इस और ध्यान दें और अच्छी सोच  के साथ जिन्दगी को भरपूर जीयें. मैं शब्द से निकलकर हम में मिल जाएँ तो जिन्दगी जीने का मज़ा सहज ही आ जाएगा. जरूर आजमाइए इसे.
*ईश्वर चन्द्र भारद्वाज  

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

doharaa charitra

यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि मनुष्य अपने लबादे में अनेक कुकृत्य करता है और उनका भंडाफोड़ होने से डरता है. इसके साथ-साथ वह दूसरों की बेइज्जति  करने का कोइ मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता है. यह भरी विरोधाभास सभी जगह सभी जाति व समुदायों में सामान रूप से पाया जाता है. सब इस बात को बुरा बताते भी हैं और ऐसा करने वालों को अच्छा नहीं मानते हैं. फिर भी यह बदस्तूर जारी है. इसे दोहरे चरित्र का सबूत नहीं तो फिर क्या कहा जाएगा?